दास्तां - ए - नादां

साजन मोहे पीहर छोड़े चले हैं बिदेस री ....... !!

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utpal


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जीवन तृष्णा उमड़ – घुमड़ मन पे बरसे

Posted On: 26 Jul, 2012  
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गरीबी – रेखा

Posted On: 26 Mar, 2012  
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जीवन संग्राम

Posted On: 23 Jan, 2012  
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अब्र ढल जाए है हरदम , यादों आया ना करो …. !!

Posted On: 6 Jan, 2012  
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कोई गाँव जलाता है किसी का दिल दहलता है……….!!

Posted On: 22 Dec, 2011  
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ख्वाब

Posted On: 12 Dec, 2011  
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है तिरा हुस्न – ऐ – रफी जलवाफरोशी ……. !!

Posted On: 30 Nov, 2011  
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युगांतर

Posted On: 24 Nov, 2011  
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दर्द आँखों से बहाया न करो …….. !!

Posted On: 15 Nov, 2011  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आदरणीय शशि जी व भ्रमर जी ! मैं सचमुच आभारी हूँ की आपनें मेरी बातों पर इतना ध्यान और समय दिया ! विश्वास करैं, मेरी मंशा कहीं भी कभी भी विवाद की नहीं है ! मैं आभारी हूँ की भ्रमर जी नैन इतनी उत्तम व्याख्या दी है ! सत्य तो बस ब्रह्म है ! श्रृष्टि तो ब्रह्म के विकार का वितान है ! विकार में सत्य क्या और असत्य क्या ! कुछ तथ्य पर गौर करें : "अश्वथामा हतौ ! नरो न गजो !" इसमें सत्य क्या असत्य क्या ! बस एक मान्यता ! शब्द वाचन की कला का विवाद ! "चोर का कर्म चोरी करना ! धर्म या अधर्म क्या कहें इसे ! या फिर कहें समाज विरुद्ध ! " "अहम् ब्राह्मो - अस्मि " कृष्ण का यह वचन सत्य ! किन्तु यदि हम ब्रह्मांश इसे कहें तो अहम् बोध किन्तु कहीं से यह असत्य नहीं ! "पूजा करना ... आस्तिक किन्तु नहीं करना क्या सचमुच नास्तिक .... !!" "युद्ध भूमि में ह्त्या करना क्या है ? यदि अधर्म तो क्यों युग पुरुषों के द्वारा इस मर्यादा को स्थापित किया गया ? अब यदि एक आतातायी कि ह्त्या एक व्यक्ति कर दे तो क्या अधर्म ? किन्तु न्याय व्यवस्था तो कारवास देगी ? तथाकथित वावास्था से विवश हो सहना और रहना क्या ? धर्म या अधर्म " "शब्द कहाँ तक महत्ता रखते हैं ? गूंगे कि लिए क्या का क्या म ?" तात्पर्य ये कि ये सब महज भाव से संचालित क्रियाएँ हैं जिनकी अपनी एक परिधि मात्र है ! परिधि का वितान शोध का विषय हो सकता है ! शोध जरूरी है ! किन्तु शोध में यदि कोई सदियों से चली आ रही परंपरा का विरोध निकले तो ? "जैसी भगवान् कि मूर्ती के पास अगरबत्ती जलाते हुए मन में खाना क्या बनेगा इसका ध्यान रहना" :d भ्रमर जी ! क्षमा चाहूंगा ! किन्तु गौर से देखा जाए तो दूध में भी तो पानी है ! और ये आकाश तो है ही नहीं ! एक शुन्य है जिसका नाम प्रचालन में आकाश दे दिया गया ! पर "चिदाकाश" का क्या ! सत्य कुछ भी हो सकता है ! किसी को दुःख ना हो ऐसा जानकर हर काम करना भी तो अधरम हो सकता है ! शायद किसी को सही मार्ग दिखा ना पायें हम ! आदि काल के समाज में शायद वस्त्र थे नहीं कौन जाने ! पर यदि हम आज वस्त्रहीन निकलें तो असमाजिक ! सर्वजन सुखाय तो कुछ भी नहीं हो सकता ! हाँ बहुजन सुखाय ही अगर कर्म कर लिया जाए तो बहुत है ! पर न तो ये सत्य है न धर्म ! ये मात्र एक कर्म है - सुकर्म ! भ्रमर जी ! मेरी मान्यता दर्शन शास्त्र को लेकर थोड़ी भिन्न है ! मुझे नहीं लगता कि दर्शन शास्त्र उलझ गया है ! हाँ , में ये कहता हूँ कि कई दर्शन शास्त्र ये तो इंगित कर ही देते हैं कि ये मार्ग सत्य कि खोज का नहीं ! हर किसी को सत्य कि खोज स्वयं करनी होगी ! राम हों या बुद्ध ! सादर

के द्वारा: utpal utpal

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मान्यवर उत्पल जी, सादर. आपके प्रश्नों ने मुझे भी उलझन में दाल दिया था. लेकिन जानना मैं भी चाहता था. मैंने आदरणीय भ्रमर जी का सहारा लिया और जो उत्तर मुझे प्राप्त हुआ वह आपको प्रेषित कर रहा हूँ. आप का प्रश्न गूढ़ है …उलझा देने वाला सहज नहीं उसकी अभिव्यक्ति और व्याख्या ..हर देश काल के अनुसार इसे परिभाषित किया गया है कहीं कहीं ..कुछ झूठ को महत्ता दे धर्म बता दिया गया ..एक कसाई गाय के पीछे पड़ा ..पूछने पर ..कोई उसे दूसरी राह बता देता है …गाय की जान बच जाती है झूठ तो बोला गया लेकिन ये सच से बड़ा हुआ …धर्म बन गया अधर्म नहीं रहा …. प्राकृतिक और ईश्वरीय शक्तियों के एक क्रम में कुछ नियम हैं सत्य है जो इस पूरे ब्रह्माण्ड का नियामक है और एक दूसरे से सब को तथा इस ब्रह्माण्ड की गति को जोड़े रखता है फिर न्याय है जो आपसी सद्भाव कायम रखता है और मानवीय खुशियों के लिए ये जरुरी है की लोग इस क्रम को मानें तथा प्रकृति के अनुसार चलें इसे आप धर्म कह सकते हैं सत्य और धर्म की विजय हमेशा हुयी है ..आज भी होती है जरुरत होती है गूढ़ तथ्यों में डूबने की ..समझने की …सत्य- सत्य है दूध -दूध है पानी- पानी –आप कह सकते हैं की हम क को क क्यों बोलें..हम इसे म ही पढेंगे ..कुछ आधार ले कर ही हम बढ़ते हैं शोध करते हैं ..फिर सूक्ष्म की बात करते हैं कुछ उसमे जोड़ते हैं कुछ निकालते हैं …सूरज होता है सत्य ठहरा गर्म होता है उसमे आग है सत्य ठहरा ..चाँद है सत्य ठहरा लेकिन उसकी बुढ़िया माई सूत कातना ..झूठ निकला …इस का शोध हम किये ..सूक्ष्म का सहारा ले कर … .आप ने कहा कुछ तथ्य सामजिक तौर पर सत्य -धर्म हो सकते हैं सूक्ष्म में महत्ता न हो उसकी …हो सकता है कुछ तथ्य कुछ चीजें कुछ पल के लिए… अपवाद तो है ही हर जगह …पर हवा है पानी है जीव है जगत है जैसे वैसे ही सत्य है ..कुछ चीजों को मान कर भी चलना होता है विश्वास से ..जो उचित हों समाज के लिए देश के लिए जन कल्याण के लिए ..पिता को हम पहले मान लेते थे पिता है एक विश्वास पर एक आधार पर किसी से सुन कर ही -आज सत्य -वह विश्वास हमारा सिद्ध भी किया जा रहा है …सत्य है … जो सर्व हितकारी हो सर्वजन सुखाय हो जिससे किसी की क्षति न होती हो जो अहित न करे दर्द न दे वही धर्म है हाँ देश काल के अनुसार इस में थोडा परिवर्तन कभी कभी तथ्य और न्याय क्या होना चाहिए क्या उस समय हितकर है हो सकता है ..पर कुछ या केवल उस वक्त के लिए …. सत्य क्या है और इसे कौन सत्य बनाता है … ये बड़ा विवादस्पद मुद्दा है और दर्शन शास्त्र इसमें उलझ कर रह गया है सब ने इस पर अपने विचार अलग अलग रखे हैं बहुत से सिद्धांत है -गणित है – जिसे इतनी आसानी से हम आप यहाँ समझ नहीं सकते …लेकिन बहुत कुछ सिद्ध किया जा चूका है की ..सत्य है जो सत्य है वही बोलो १+१ को दो सिद्ध किया जा चूका है तो दो ही बोलो अब हम अगर हम न माने कही सुनी लिखी बातें और एक प्राकृतिक क्रम तो सब कुछ उल्टा हो जाएगा और हम क को ख पढेंगे ..महाभारत को रामायण कहेंगे ….झूठ को सच और सच को झूठ .. अब बेहतर है की इस मानव जगत में जो सदियों से माना गया है जो व्यवहारिक है जो समाज के काम का है -उसे मानें जाने उस पर शोध करें और यदि हम सब के समक्ष उस को बदल पायें जैसे चाँद और गृह अन्य पदार्थ पर हम कुछ जानकारी कर पाए सिद्ध किये दिखाए …..तो ही कुछ बात बने … फिलहाल तो किसी पदार्थ को हम अगर कलम माने हैं तो उसे कलम ही कहें किताब न कहें -तो कलम सच है और किताब झूठ .. आइये हम व्यावहारिक जगत की बात करें स्वभाव पर नियंत्रण में- सत्य , धर्म और अहिंसा की और नैनो टेक्नोलोजी की बात पदार्थों की खोज में …… तो आइये सच बोलें ……धर्म को अपनाएँ …. किसी कवि ने ठीक ही कहा है ….. सत्य क्या है? होना या न होना? या दोनों ही सत्य हैं? जो है, उसका होना सत्य है, जो नहीं है, उसका न होना सत्य है। मुझे लगता है कि होना-न-होना एक ही सत्य के दो आयाम हैं, शेष सब समझ का फेर, बुद्धि के व्यायाम हैं। किन्तु न होने के बाद क्या होता है, यह प्रश्न अनुत्तरित है। प्रत्येक नया नचिकेता, इस प्रश्न की खोज में लगा है। सभी साधकों को इस प्रश्न ने ठगा है। शायद यह प्रश्न, प्रश्न ही रहेगा। यदि कुछ प्रश्न अनुत्तरित रहें तो इसमें बुराई क्या है? हाँ, खोज का सिलसिला न रुके, धर्म की अनुभूति,

के द्वारा: shashibhushan1959 shashibhushan1959

के द्वारा: utpal utpal




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